क्या आप भगत सिंह बनना चाहेंगे? - गुमनाम लेखक
क्या आप भगत सिंह बनना चाहेंगे? क्यों किसी को भगत सिंह ही बनना चाहिए?
इन सवालों का जवाब देने के लिए हमें ठीक से सोचना होगा कि क्या हम भगत सिंह को
जानते भी हैं या
नही ? कोई भगत सिंह कैसे बनता होगा सिर्फ
बन्दूक पकड़कर या अपने विचारों की यात्रा से ?
आज जन्मदिन
के मौके पर आप हर राजनीतिक दल के मुख्य नेता को भगत सिंह को याद करते हुए देख रहे
होंगे , ट्वीट करते हुए देख रहे होंगे l इन सब नेताओ से हम एक सवाल पूछ सकते है कि
क्या आप के दलों में किसी भी नौजवान में भगत सिंह बनने की प्रतिभा ? अगर प्रतिभा
नही है तो क्या आपने अपने दलों किसी भी नौजवान
को भगत
सिंह बनने का अवसर भी प्रदान किआ है ? क्या भगत सिंह को याद करने वाले किसी भी
नेता के दलों में कोई ऐसा नेता है जो अपनी सोच से भगत सिंह के आसपास भी है ?
भगत
सिंह की एक तस्वीर लेकर ट्वीट कर देना व्हाट्सएप पर मैसेज कर देना यह सब अच्छा
लगता है कि कोई याद कर रहा है लेकिन क्या यह पर्याप्त है ?
अखबारों
में भगत सिंह के जन्मदिन पर विज्ञापन छपे हैं l देश के अलग अलग शेहरों के चौराहे
पर बनी भगत सिंह की प्रतिमा पर भी फूल माला चढ़ाने के लिए अलग अलग पार्टी के लोग
पूर्ण रूप से बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे होंगे l जिससे यह साबित होता है की भगत सिंह निश्चित
ही लोकप्रिय हस्ती हैं l लेकिन जब वे प्रेरित करते हैं तो भगत सिंह पैदा क्यों
नहीं होते l
या
भगत सिंह हमारे पास कई हैं मगर हम उन्हें भगत सिंह के साँचे में रख कर रख कर देखना
नहीं चाहते l इन्टरनेट की दुकानों में भगत सिंह और छे गुएवेरा के रंगबिरंगे टीशर्ट
मौजूद है l हमने पिछले कई सालो से भगत सिंह की जयंती मनाते-मनाते उन्हें टी शर्ट
से चिपका तो दिया लेकिन क्या सीने से भी लगाया है ?
दुकानों
में भगत सिंह बस एक उत्पाद है जिसके ज़रिए लोगो में जोश पैदा किया जाता है पर क्या
उन नौजवानों हमे जज्बा नज़र आता है ?
इसे
लेकर ज्यादा रोने धोने की जरूरत नहीं है l जरूरत है कि भगत सिंह को हम समझे l आज
हर राजनीतिक दल के लोग भगत सिंह को अपना लेते हैं l उनके जन्मदिन पर खुशियां मनाते
है और शहीद दिवस पर श्रधांजलि देते है l लेकिन आप आगे पढ़ कर अपने विवेक से काम
लीजिये और सोचिये की आज अगर वह जिंदा होते तो कौनसा दल उन्हें पद देता, नेतृत्व
देता l
भगत
सिंह ने 6-अप्रैल-1928 को नौजवान भारत सभा, लाहौर के घोषणापत्र में कहाँ था –
“ धार्मिक
अन्धविश्वास और कट्टरपन हमारी प्रगति में बहुत बड़े बाधक हैं। वे हमारे रास्ते के
रोड़े साबित हुए हैं और हमें उनसे हर हालत में छुटकारा पा लेना चाहिए। जो चीज
आजाद विचारों को बर्दाश्त नहीं कर सकती उसे समाप्त हो जाना चाहिए। '’ इसी प्रकार की और भी बहुत सी कमजोरियाँ हैं जिन
पर हमें विजय पानी है।“
अगर यही बात आज कोई छात्र नेता अपने विश्वविद्यालय
परिसर में बोल दे की जो चीज आजाद विचारों को बर्दाश्त नहीं कर सकती उसे समाप्त
हो जाना चाहिए।
तो हम लोग जो कि भगत सिंह को इतना चाहते हैं क्या
हम कहेंगे की इस विश्वविद्यालय को बंद कर देना चाहिए या फिर उस छात्र नेता के
समर्थन में आयेंगे ? सोचने वाली बात है l
घोषणापत्र में आगे भगत सिंह कहते है की दुनिया
के नौजवान क्या-क्या नहीं कर रहे हैं
“ जबकि हम भारतवासी हम क्या कर रहे है l पीपल
की एक डाल टूटते ही हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएँ चोटिल हो उठती हैं! बुतों को
तोड़ने वाले मुसलमानों के ताजिये नामक कागज के बुत का कोना फटते ही अल्लाह का
प्रकोप जाग उठता है और फिर वह ‘नापाक’ हिन्दुओं के खून से कम किसी वस्तु से सन्तुष्ट
नहीं होता! मनुष्य को पशुओं से अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए, लेकिन यहाँ भारत में लोग पवित्र पशु के
नाम पर एक-दूसरे का सिर फोड़ते हैं। “
यह बात भगत सिंह ने 1928 में कही थी पार जो 90 साल बाद भी प्रासंगिक
है l पर क्या भगत सिंह का टीशर्ट पहनने वाले लोग उन्हें अपना आइकॉन मानाने
वाले लोग आज भगत सिंह की तरह मुखरता से सोच रहे हैं ? क्या कोई नौजवान यह कहते हुए
किसी पार्टी की कार्यकारिणी में प्रवेश कर सकता है कि धर्मों ने हिंदुस्तान का
बेड़ा गर्क कर दिया है ?
भगत
सिंह जून, 1928 को ‘कीर्ति’ में छपे लेख ‘साम्प्रदायिक दंगे और
उनका इलाज’ में कहते है –
“ हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नजर आता
है। इन ‘धर्मों’ ने हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया
है। और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। धर्म के रौब
को कायम रखने के लिए लोग डण्डे लाठियाँ, तलवारें-छुरें हाथ में पकड़ लेते हैं और
आपस में सर-फोड़-फोड़कर मर जाते हैं l
। यहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं
और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही
नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्रा कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और
जो ‘समान
राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’
के
दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे
हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। “
1928
का का यह साल था हिंदू मुस्लिम दंगे हो रहे थे तब भगत सिंह की उम्र क्या रही होगी
l पूरी जिंदगी ही बस कुछ 23 साल और चंद महीने की
थी
l भारत से ज्यादा पाकिस्तान पर बहस करने वाली मीडिया पर भगत सिंह 1928 में ही कह
गये थे l
“ दूसरे
सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं,
अखबार
वाले हैं।
पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था। आज बहुत ही
गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों
की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं,
कितनी
ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे
हैं। ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो l ”
वह
आगे लिखते है की -
“ अखबारों
का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना,
साम्प्रदायिक
भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी
राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना,
संकीर्णता
का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना,
लड़ाई-झगड़े
करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि
भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में
सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या ?’ “
क्या
कोई पत्रकार कल जन्मदिन के अवसर पर भगत सिंह के विचार आप तक चीख चीख कर
पहुचाह्येगा ? ना-मु-म-कि-न !
हमने अपने आदर्शो को इतना घिस दिया है कि उनके विचार अब हमें उकसाते भी नही है l इन दिनों नहीं इन दिनों जयंती और पुण्यतिथि की बाढ़ आ गई है l ऐसी होड़ मची है कि समझना मुश्किल हो गया है कि कल जिस नेता ने किसी की जयंती पर उसे अपनी प्रेरणा बताया था वाही आज आज भगत सिंह को भी अपनी प्रेरणा बता रहा है l फिर अगले दिन वह किसी और की जयंती पर किसी और को अपनी प्रेरणा बतायेगा l
ये
वह नेता हैं जिन्हें गांधी से लेकर आंबेडकर, पटेल, भगत सिंह, लोहिया और दीनदयाल
उपाध्याय तक के अंश होने का दावा करते हैं l सवाल बनता है की - अगर इतने
महापुरूषों से प्रेरणा पाने वाले नेताओं की अगर हमारे देश में भरमार है फिर तो हम
राजनीति के किसी स्वर्ण युग में जी रहे होंगे ?
जेएनयू-जामिया का प्रसंग उठा तो कुछ लोगो ने कहा
-
की विश्वविद्यालय
में राजनीति नहीं होनी चाहिये l वहां विद्यार्थी पढने आते है l मुमकिन है कि वह लोग
भी आज भगत सिंह को अपनी प्रेरणा बता रहे होंगे l ट्वीट कर रहे होंगे l लेकिन भगत
सिंह ने 1928 में एक लेख लिखा “कीर्ति” में छपा हुआ l
पहले
ही अनुछेद में वह लिखते हैं –
“ इस
बात का बड़ा भारी शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले नौजवान(विद्यार्थी) राजनीतिक
या पोलिटिकल कामों में हिस्सा न लें। विद्यार्थी से कालेज में दाखिल होने से पहले
इस आशय की शर्त पर हस्ताक्षर करवाये जाते हैं कि वे पोलिटिकल कामों में हिस्सा
नहीं लेंगे।
यह
हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है,
उन्हें
अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और
उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं?यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी
निकम्मी समझते हैं l
वे
पढ़ें। जरूर पढ़े! साथ ही पालिटिक्स का भी ज्ञान हासिल करें और जब जरूरत हो तो
मैदान में कूद पड़ें और अपने जीवन को इसी काम में लगा दें। “
आज
तमाम वो वाइस चांसलर भी भगत सिंह के जन्मदिन पर ट्वीट कर रहे होंगे जो अपने छात्र
संघ का चुनाव तक नहीं होने देते l
भारत का वो छात्र वो अपने विश्वविद्यालय में वोट के बुनियादी अधिकार को हासिल नही कर सकता क्या उसे हक है की वह टी शर्ट पर भगत सिंह का फोटो लगाकर घूमे ?
जो
राजनीतिक दल अपने दल के भीतर सामाजिक मुद्दों पर घनघोर चर्चा ना करवाएं क्या
उन्हें हक है की वो उन्हें भगत सिंह के जन्मदिन या शहीदी दिवस का इस्तेमाल करें l
यह कैसे
हो सकता है कि हर दल के लिए भगत सिंह प्रिय हो गए हैं जबकि उनके विचारों पर चलने
का साहस किसी में नहीं दिखता l क्या आपने कभी सुना है कि किसी भी दल में
सांप्रदायिकता पर खुलकर बहस हो रही है l छोटे से बड़े नेता खुलकर बोल रहे हैं अपनी
पार्टी के बारे में भी और दूसरी पार्टी के बारे में भी l क्या ऐसा होता है ?
तो
फिर वो कौन लोग है जो भगत सिंह को गोद में लिए घूम रहे है l भगत सिंह ने कहा था कि
व्यक्ति को मारना आसान है लेकिन विचार को नहीं जा सकता l क्या आज के दौर में उल्टा
तो नहीं हो जहां भगत सिंह और अन्य एतिहासिक व्यक्तित्व को व्यक्ति के रूप में तो
जिंदा रखा गया है ताकि उन्हें अपना
दोस्त-दुश्मन बताकर इस्तेमाल किआ जा सके लेकिन पर उनके विचारों को धीरे धीरे
दफनाया जा रहा है ?
You have
been warned!
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